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बहुत गहनतर बात तो नहीं, पर‌ विशेष जरूर है। आना‌ -जाना, मिलना -मिलाना, हैं क्या ये मैं अक्सर सोचता हूं।। 'जिव जीवहिं माया लपटानी' , पहले पढ़ा था अब देख भी रहा हूं। घर से निकलने के बाद कुछ अजनबी अपनों में क्यों  बदल जाते हैं मैं अक्सर सोचता हूं।।  जब कभी गांव से निकलता हूं, तो ग्रामेत्तर अजनबी लगता है। कभी कभार न भी लगे, तो क्षेत्रवाद पीछा नहीं छोड़ता तदन्तर कोई कुत्ता भी मिला तो अपना जनपदी लगता है किन्तु ये सब बहुत दीन-हीन क्यों लगते हैं? उस ढ़ाई आखर के आगे----- मैं अक्सर सोचता हूं।
                      कहानी  ' खुुशबू माटी के'           ------------------------------------------------------------- इस दुनिया में कौन सा व्यक्ति कैसा है और क्या कर सकता है, परमपिता परमेश्वर ने किसे कितना पुरुषार्थ दिया है ?इस बात का पता किसी को नहीं है कई -कई बार अपेक्षित लोगों की अपेक्षा उपेक्षित लोग कुछ ऐसा कर जाते हैं जिसकी किसी को उम्मीद भी नहीं होती। ऐसा ही मोहन गांव का एक सीधा-सादा लड़का था किंतु उसका सीधा- सादापन अबोध्यता  से भरा हुआ नहीं अपितु वह शक्ति शील और सौन्दर्य से युक्त सीधा-सादापन था । मोहन और उसके पड़ोसी दोस्त सोनू, रामू इत्यादि लोग शारीरिक पुष्टता के लिए व्यायाम और कुश्ती करते किंतु अनभ्यस्त स्थिति में। वही गांव में अजेय मंगरू पहलवान से बात ही बात में एक दिन मोहन की कुश्ती छिड़ गई, पहलवानों का कोई जोड़ नहीं एक बीस का तो एक तीस का । यह स्थिति देखकर गिरधारी काका परधान भैया से बोले .. अरे परधान भैया मोहन का  मना करौ, नहीं अनरथ होइ जई !! अरे मैं मना तौ कीन्यों पै जवय वह म...