विचारी आंखें---- ----------------------------------------------------------------------- राजा करवा रहा है, अपनी अथक शक्ति इच्छा - प्रतीक्षा से इन भोले नेत्रों पर अत्याचार, जो नहीं लड़ाते कभी बात सीधे सादे विचारे जिनसे सधती है पहचान राजा की भी, आजकल उन्हीं की सारी देह में उपटे जा रहे हैं लाल लाल कोड़े। ये तो हमेशा रखती हैं ध्यान उसका पर विषमता की इस दुनिया में नहीं देता कोई ध्यान इनका मंत्री- संत्री सब हो गए हैं चापलूस! मीडिया वीडिया सोचती है थोड़ा बहुत लगाने का तेल लेकिन इंगुदी का नहीं रहा उसके पास भी ,, है रिफाइंड का ही! कवियों की तो पूंछों मत वो भी उसी के साथ हैं, आज से नहीं सनातन से ! ज्येष्ठ आषाढ़ दोनोें में वे इन्हीं को दोषी ठहराते हैं मैं भी वहीं करूंगा, क्योंकि ये हैं ही इसी लायक, पकड़ क्यों नहीं लेते दूसरा सूबा जाके जैसे करतें हैं अक्सर आजकल के लोग। पर शायद घूसखोर हैं ये भी! लगाए रहते हैं टकटकी थोड़ सी झलक पाने के लिए 'मन लेहु पै ...
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Showing posts from March, 2020
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विश्वास---- ---------------------------------------------------- क्या हो गया इसको, जो इतना विराट् होकर आज बनता जा रहा है प्रतीक निष्फलता का? कंपता है अपने ही अंश से और जिसे खुद पर भी नहीं रहा विश्वास! एक समय क्या इसी के लिए लोग कहते थे, 'विश्वासं फलदायकं'? छुपा जा रहा है कोने में मारे संकोच के न जाने किसने इसकी लूटी है इज्जत अथवा इसने किसी की? श्वास में 'वि' उपसर्ग पूर्वक बना ये शब्द आज विशिष्टता का नहीं सामान्य से भी कमतरता का बोधक समझ में आता है जिसके अन्दर होता है किसी के प्रति, कभी कभी घोटने लगता है ये उसी की श्वांस! पर इसमें इसका कोई दोष नहीं कदाचित! क्योंकि करने लगे हैं लोग समर्थन ज्यादा अकार का जिसके कारण घटने लगी है इसकी प्रतिरोधक क्षमता और लगातार बना जा रहा है यह अविश्वास! कारण एक यह भी है, क्या करे कोई इसके हाथ में हाथ धर के? क्योंकि जो इसका साथ पकड़ता है नाहक में एक न एक दिन सहना पड़ता है उसको, इसके घात का कुठाराघात! ...
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प्रेमिका के प्रति एक विशुद्ध प्रेमी की भावना---- ------------------------------------------------------------------------ खोए रहते हैं हम रात-दिन आजकल, तेरी यादों में क्या हम बताएं सनम। आप करते हैं बातें ये उस पार की, हम तो रहते सदा आप ही में मगन। ईश से अब हमारी तमन्ना रही, छांव में आप हों धूप में हम जिएं। खुशबू फूलों में जैसे रहे हिल-मिली, हम रहें आप में यूं ही खुद भूलकर। कितनी है जिंदगी ये पता है कहां, क्या कहें साथ रहना है कब तक यहां? हामी थोड़ी सी गर आपकी मिल गई, जानूंगा आज हमको खुदा मिल गया। बात कहनी थी जो अब वो ये है सुनो, इस धरा पर हूं जब तक रहूंगा तेरा। ...
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आहट प्रेम की ---- ----------------------------------------------------------------------- मारा जाता है , बार बार बुद्धि की तलवार से वह! जो होता है बिना पानी का दूध। रोता रहता है , पड़े पड़े कोने में एक तरफ बन जाती है उसकी निश्छलता उसी के लिए छलनामयी। भावनाओं के प्रवाह में तार्किकता का नहीं रहता शेष एक भी कंकण कहते हैं सीख कर भूत से, इस समय करना चाहिए चिंतन भविष्य का करता है कोशिश वह बार बार पर शीतलता की थोड़ी सी तपन पाकर बह चलता है , इतना तेज कि रुक नहीं पाता रोकने से स्वभावत: ! और गिर जाता है एक गहरी खांई में जो नहीं चढ़ पाता कभी ऊपर। न जा पाता बहुत गहराई में कि मिल जाए जल, जल से!क्योकि बहुत कठोर होता है आवरण उस खांईं का! मैं जानना चाहता हूं, उस कन्हैया से? जब जाना था छोड़ के राधा को , तो क्यों व्यर्थ में दिए संदेश विशुद्ध प्रेम का? क्यों बनाया ये प्यार वार जिससे ठगी जाएं हजारों हजार राधिका और श्यामेत्तर श्याम ? क्यों कोई अपर...
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धूलिकोत्सव के झरोखे से -- --------------------------------------------- यांत्रिक होते जाते हम, है पक्ष बुद्धि का हावी। यदि भावाभाव रहा तो, क्या होगी समस्या भावी? चिंतन करते क्या हम सब, इस विषय गहनतर को ले? इव धूमकेतु जो बनकर , आकस्मिक तूफां डोले।। देखा तुमने कितनों को, जो रूप मूर्त में आया? होली की शुभकामनाएं, झोली में भर कर लाया? कहते उसको रंगोत्सव, जिसमें विभिन्न रंग हो पर। जीवन का एक अमिट रंग, मानवता ना हो कमतर।। संकल्पित हों अब हम सब, आओ मिलकर होली में। ना मिटे रंग वह गहरा, भर जाए हमारी टोली में।। -- जी.एल.'चित्रकूटी'