विचारी आंखें----
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राजा करवा रहा है,
अपनी अथक शक्ति इच्छा - प्रतीक्षा
से इन भोले नेत्रों पर अत्याचार,
जो नहीं लड़ाते कभी बात
सीधे सादे विचारे
जिनसे सधती है पहचान
राजा की भी,
आजकल उन्हीं की सारी
देह में उपटे जा रहे हैं लाल लाल कोड़े।

ये तो हमेशा
रखती हैं ध्यान उसका
पर विषमता की इस दुनिया में
नहीं देता कोई ध्यान इनका
मंत्री- संत्री सब हो गए हैं चापलूस!
मीडिया वीडिया सोचती है
थोड़ा बहुत लगाने का तेल
लेकिन इंगुदी का नहीं रहा उसके
पास भी ,,
है रिफाइंड का ही!

कवियों की तो पूंछों मत
वो भी उसी के
साथ हैं, आज से नहीं सनातन से !
ज्येष्ठ आषाढ़ दोनोें में
वे इन्हीं को दोषी ठहराते हैं
मैं भी वहीं करूंगा,
क्योंकि ये हैं ही इसी लायक,
पकड़ क्यों  नहीं लेते दूसरा सूबा जाके
जैसे  करतें हैं अक्सर
 आजकल के लोग।

पर‌ शायद घूसखोर हैं
ये भी! लगाए रहते हैं टकटकी
थोड़ सी झलक पाने के लिए
'मन लेहु पै देहु छटांक नहीं'
के ऊपर होती है मेरी खूब इनसे बहस
मैं इन्हें इड़ा का  रूप भी दिखाता हूं कई बार
पर ये तो हमेशा यही कहते हैं
छटांक से भी कम हमें हमारे
हिस्से की गर दर्शन की धूप मिल जाती
तो सूख जाता बहुत जल्द ही ये
पानी जो बह रहा है लगातार।

                                               - गनेशी!!!!
                                        दिनांक - ३१/०३/२०२०
                                         समय - रात्रि - ११:५६ बजे!







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