विश्वास----
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क्या हो  गया इसको,
 जो इतना विराट् होकर
 आज  बनता जा रहा है प्रतीक
निष्फलता का?
कंपता है अपने ही अंश से
और जिसे खुद पर भी नहीं रहा विश्वास!
एक समय क्या इसी के लिए लोग कहते
थे, 'विश्वासं फलदायकं'?

छुपा जा रहा है कोने में मारे संकोच के
न‌ जाने किसने
इसकी लूटी है इज्जत
अथवा इसने किसी की?

श्वास में 'वि' उपसर्ग पूर्वक
बना ये शब्द
आज विशिष्टता
का नहीं सामान्य से भी
कमतरता का बोधक समझ में आता है
जिसके अन्दर होता है किसी के प्रति,
कभी कभी घोटने लगता है
ये उसी की श्वांस!

पर इसमें इसका कोई
दोष नहीं कदाचित!
क्योंकि करने लगे हैं
लोग समर्थन ज्यादा
अकार का जिसके कारण
घटने लगी है इसकी प्रतिरोधक क्षमता
और लगातार बना जा रहा है
यह अविश्वास!

कारण एक यह भी है,
क्या करे कोई इसके
हाथ में हाथ धर के?
क्योंकि जो इसका साथ पकड़ता है
नाहक में एक न एक दिन
सहना पड़ता है उसको,
इसके घात का कुठाराघात!

                                         -- जी.एल.'चित्रकूटी'!!!

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