त्याग.....
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ये ग़म भी हमारा ऐसा है,
न कह सकते न कर सकते।
न आ सकते न जा सकते ,
न रो सकते न गा सकते।।

 हों जलकण भी न जहां किंचित्,
न हो शीतल न प्यारा हो।
 रहे नीड़ हमारा निर्जन में,
जो त्याग तपां से न्यारा।।

वह निर्जनता भी ऐसी हो,
जिसमें जन जन का वास मिले।
जहां कण्टक मध्य अकण्टकता,
बांटती सुरभि का दान मिले।।

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