आहट  प्रेम की ----
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मारा जाता है ,
बार बार बुद्धि की तलवार से वह!
जो होता है बिना पानी का दूध।

रोता रहता है ,
पड़े पड़े कोने में एक तरफ
बन जाती है उसकी निश्छलता उसी के लिए छलनामयी।
भावनाओं के प्रवाह में तार्किकता का
 नहीं रहता शेष एक भी कंकण

कहते हैं सीख कर भूत से,
इस समय करना चाहिए चिंतन भविष्य का
करता है कोशिश वह बार बार
पर शीतलता की थोड़ी सी तपन  पाकर बह चलता है ,

इतना तेज कि रुक नहीं पाता
रोकने से स्वभावत: !
और गिर जाता है एक गहरी खांई में जो नहीं चढ़ पाता कभी ऊपर।
न जा पाता बहुत गहराई में कि मिल जाए जल,
 जल से!क्योकि बहुत कठोर होता है
आवरण उस खांईं का!

मैं जानना चाहता हूं,
उस कन्हैया से?
जब जाना था छोड़ के राधा को ,
तो क्यों व्यर्थ में दिए संदेश विशुद्ध प्रेम का?
क्यों बनाया ये प्यार वार
जिससे ठगी जाएं हजारों हजार राधिका
और श्यामेत्तर श्याम ?

क्यों कोई अपरिचित
क्षण भर में बन जाता है चिरपरिचित?
क्यों कांटो के बीच रहकर भी,
फूल बांटता है लगातार अपनी खुशबू
और सरिता नहीं पीती पानी लगा के चुल्लू?
दिन भर दाने चुंग बटोरकर ,
नीड़ पर आते हैं पंछी।
पर क्या करता है नीड़ इंतजार उनका उतनी ही बेचैनी से?
जितनी उत्सुकता से
वो चले आते हैं दौड़े??


पर शायद  है असलियत यही
नहीं है कोई समझने वाला आज उस प्रेम को!
क्योंकि नहीं रहे वो लैला-मजनूं, हीर -रांझां, रोमियो-जूलियट
पर 'लहना' आज भी मिलता है
 कहीं-कहीं ही सही
एकाध 'लहना' जो दे देता है हंसकर जान,
अपनी सूबेदारनी के लिए ।

गनेशी : एक साहित्यिक प्रेमी!!!
दिनांक/ दिन - 16/03/2020, सोमवार!





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