बहुत गहनतर बात तो नहीं,
पर‌ विशेष जरूर है।
आना‌ -जाना, मिलना -मिलाना,
हैं क्या ये मैं अक्सर सोचता हूं।।

'जिव जीवहिं माया लपटानी' ,
पहले पढ़ा था अब देख भी रहा हूं।
घर से निकलने के बाद कुछ अजनबी
अपनों में क्यों  बदल जाते हैं
मैं अक्सर सोचता हूं।।

 जब कभी गांव से निकलता हूं,
तो ग्रामेत्तर अजनबी लगता है।
कभी कभार न भी लगे,
तो क्षेत्रवाद पीछा नहीं छोड़ता
तदन्तर कोई कुत्ता भी मिला तो अपना जनपदी लगता है
किन्तु ये सब बहुत दीन-हीन क्यों लगते हैं?
उस ढ़ाई आखर के आगे-----
मैं अक्सर सोचता हूं।

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