कहानी  ' खुुशबू माटी के'
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इस दुनिया में कौन सा व्यक्ति कैसा है और क्या कर सकता है, परमपिता परमेश्वर ने किसे कितना पुरुषार्थ दिया है ?इस बात का पता किसी को नहीं है कई -कई बार अपेक्षित लोगों की अपेक्षा उपेक्षित लोग कुछ ऐसा कर जाते हैं जिसकी किसी को उम्मीद भी नहीं होती। ऐसा ही मोहन गांव का एक सीधा-सादा लड़का था किंतु उसका सीधा- सादापन अबोध्यता  से भरा हुआ नहीं अपितु वह शक्ति शील और सौन्दर्य से युक्त सीधा-सादापन था । मोहन और उसके पड़ोसी दोस्त सोनू, रामू इत्यादि लोग शारीरिक पुष्टता के लिए व्यायाम और कुश्ती करते किंतु अनभ्यस्त स्थिति में। वही गांव में अजेय मंगरू पहलवान से बात ही बात में एक दिन मोहन की कुश्ती छिड़ गई, पहलवानों का कोई जोड़ नहीं एक बीस का तो एक तीस का । यह स्थिति देखकर गिरधारी काका परधान भैया से बोले ..
अरे परधान भैया मोहन का  मना करौ, नहीं अनरथ होइ जई !!
अरे मैं मना तौ कीन्यों पै जवय वह मानय  !
  इस पर गिरधारी काका और दो एक दर्शकों ने फिरंगिया को तुरंत मोहन के  घर भेजा कि वह मोहन के बाबू को बुला लाए,फिरंगिया  झट से दौड़ गया। इधर  मंगरु मोहन को धान के पैरा की तरह उठा -उठा कर पटके जा रहा था किंतु इसी बीच मोहन ने ऐसा दांव-पेंच लगाया कि मंगरू चित्त हो गया और दर्शकों में खुशी की लहर दौड़ गई मोहन‌! मोहन!! कहकर सोत्साह सब चिल्ला उठे। तब तक मोहन के बाबूजी दो-चार लोगों के साथ हांफते हुए पहुंच चुके थे, मोहन को स्नेह से डपटकर बोले..
रुक मैं तुही लड़वाऊं!!
इसी बीच हरषू भाई( मोहन के पिता ) को समझाते हुए परधान काका  मोहन से मन में उत्साह और उमंग भरकर बोले .. एत्ता कसरती पहलवान का चित्त  कसत कइ दीने दादू!
अरे काका या बहुत दिना से डिंग मारत रहा है न ,
औ काका आदमी के मन मा आत्मविश्वास होय तो आदमी का नहीं कइ सकय!
सही कहत हा  दादू, आज तैं या बात का साबित कइ दीने!!
 एक दिन मोहन सुबह-सुबह अपना मोबाइल चला रहा था एकाएक उसके चेहरे में खुशी की लहर दौड़ गई और सोत्साह बोला ..
अरे गजब! अम्मा! ए अम्मा!!(दौड़कर मां के पास जाकर)
देख म्वा इन्ट्रेंश निकर गा , जऊं मैं परिच्छा दीने रहे हौं!
अब म्वा एडमीशन होइ जई , शहर मां ।
का?
हां बांदा के डिग्री कॉलेज मां अम्मा!
चुप रह , फे तैं उत्ती दूर लग्घइन मां पढ़ंय जइहे!
न कउनो जान न‌ पहिचान हुंआं कहु से न कुछ!
अरे मैं कुछ बड़ा करय चाहत हौं अम्मा मो बात समझ । इसी बीच चंदा कुछ विनोद भाव से बोली.. बाबू जी अब कलक्टर बनि हैं।
ए पगलिया तैं न चुप रइहे !
मोहन की मां को पहले मोहवश थोड़ा दुख तो  हुआ, किंतु फिर बेटे की पढ़ाई और उसकी सुख समृद्धि के लिए बाहर पढ़ाई करने जाने के लिए हामी भर दीं। मोहन के पिता हरखू गांव के एक साधारण किसान थे, जो खेती करते -करते ऊब चुके थे और वह चाहते थे कि उनका बेटा कुछ नौकरी -चाकरी पा जाए जिससे आगे का जीवन आराम से कट सकें क्योंकि खेती किसानी में अब कुछ बचा नहीं है । रक्षाबंधन के चंदा भैया को राखी बांधते समय हंसते -हंसते यकायक सिसकने लगी मोहन ने कहा..
 अम्मा या चंदा अचानक रोवंय कहे लाग?
आगे साल के रक्षाबंधन मा पता नहीं तैं कहां रइहे
भैया! अइहे  कि ना? इस पर मोहन उसे समझाते हुए बोला
चुप रह पागल मैं कउनो विदेश थोई आय जात हौं!!
दूसरे दिन जब मोहन को शहर जाने का समय आता है , तो उसके बाबू अम्मा चंदा सोनू,रामू और प्रधान काका तथा गिरधारी काका सहित सभी पड़ोसी इकट्ठा रहते हैं, मोहन बड़े बुजुर्गों के पैर छूकर जब चलना चाहता था तभी पिताजी ने  जिम्मेदारी भाव से कहा .. टिकट का खुल्ले पैसा हैं न दादू!
हाँ बाबू हैं..
औ पढय- लिखंय  मा बस न रहे भला,  खांय- पिंयय का ध्यान द्यात जये। औ पहुंचतै फोन कई दीने!
और मां रुंधे हुए कण्ठ से मोहन के पिता की ओर देखकर बोली  एसे कहि द्याव शहर मां जाके कउनो मेम से विआह न कई लेई!  इस पर प्रधान काका अपनी माटी और गांव के संस्कार को भूल न जाने के लिए मोहन से कहते हैं , शुभ समय जानकर मोहन की मां अत्यंत दुखी होने पर भी इस प्रकार अपने आंसुओं को रोकने का यत्न करने लगी, जैसे वह बहुत खुश हो, मोहन बस में बैठ गया अब मोहन की मां का गला इस प्रकार रुंध गया है कि वह अपने लाल को अपना ख्याल रखने के लिए कहना तो चाहती है पर आंसू रोकने के कारण कम्बख्त गले से आवाज़ हि नहीं निकलती, मां और बेटे की आंखे एक दूसरे को गाय और प्यासे बछड़े की तरह देख रही हैं किन्तु बस चालू हो गई और धीरे-धीरे उड़ते हुए पक्षी की भांति आंखों से ओझल हो गई।
प्रवेश मिल जाने के बाद जब पहली बार मोहन कालेज गया , तो उसने देखा कि दो लड़कियां और दो तीन लड़के दो लड़कों को मुर्गे की तरह झुकाए हुए हैं, वह लोग बार बार खड़े होना चाहते हैं,  किन्तु एक नौजवान बड़े रौब के साथ उन्हें फिर झुका देता  है। तब तक एक परी सी सुन्दर और शासिका की उन्मुक्त चाल तथा अत्याधुनिक ड्रेश से लैश राधा सुमन के साथ आ गई थी। उन्हें देखकर बोली.. गुड,वैरी गुड( Good,very good)
 मोहन को आता देखकर सुमन ने राधा से इस प्रकार कहा जैसे एक शिकारिणी अपनी शिकार मर्मज्ञी से कह रही हो  .. अरे वो देख राधा आज एक नया मुर्गा आ रहा है !
ओ!!!  ये तो देशी मुर्गा है ,
आने दो टेस्ट करती हूँ।
मोहन जैसे ही पास आया उसकी वेश-भूषा देखकर देखकर मजाक उड़ाने के भाव में राधा बोली  .. हाय! डार्लिंग ( hi dorling )
अपने लिए पहली बार ऐसे शब्द सुनकर मौहन भौचक्का रह गया, उसको लगा इतनी मधुर आवाज से कौन बोल रहा है, कोयल है या मोर! वह उस आवाज को खोजने के लिए इधर-उधर देखने लगा। तब तक राधा उसके और पास जाकर बोली.. हेलो आएम टॉकिंग टू यू (Hello iam toking to you!)
यू हैंडसम (You handsome!) मोहन थोड़ा हंसते-हंसते बोला जी ठैंक यू ठैंक यू ! ( Thank you thank you!) मोहन की इस बात पर सब लोग हंस पड़े, तब तक राधा बोली चलो अब मुर्गा बन जाओ , मोहन को आश्चर्य हुआ वह आश्चर्य से इधर-उधर देखने लगा तब तक विक्की बोला ए चल मुर्गा बन , मोहन बड़े शालीनता भाव से बोला अरे भैया यह क्या कर रहे हो, तब तक सौरभ आगे आकर बोला .. ए झुक, तेरी सामत आई है क्या? मोहन जैसे  सारे मामले को समझकर बोला , अरे भाई ये सब क्या कर रहे हो यहां सब लोग पढ़ने आए हैं! इतना सुनकर विक्की से रहा नहीं गया , उसने मोहन को ऐसा धक्का दिया कि वह सीधा जमीन‌ पर गिरा।मोहन‌ कुछ सोचकर उठा और उन्ही के एक साथी को अपना सामान देते हुए बोला.. भाई थोड़ा पकड़ना!
 विक्की को लगा कि वह मुर्गा बनने जा रहा है , सहानुभूति परक भाव से बोला , पकड़ ले! पकड़ ले! तब तक मोहन ने विक्की को देहाती स्टाइल में उठाकर पटक दिया, बोला आओ कोई और है ।राधा विपक्ष का नेतृत्व करती हुई बोली.. कमान !( Common!) तब तक उभयलिंगी उसके पास पहुंचा और अपनी स्टाइल में उसे मारने लगा, मोहन ने उसके पीछवाड़े में एक लात जमाया , वह भागते हुए बोला , शरम नहीं आती अबला के तबला पे लात मारते हुए। इस प्रकार राधा का दल-बल कमजोर पड़ गया और वह तिनक कर जाने को हुई, तब मोहन बोला , आ आ तहूं का मुर्गी बनाऊं। सौरभ कुछ डरते-डरते बोला , भाई इसे अभी और पकड़ना है!
धत् तेरे....
सभी आसुरी शक्तियां पलायन कर गईं तब दलजीत सिंह को चैन की सांस मिली ,  मोहन को शाबासी देते हुए बोला वाह! पाजी, तैने तो कमाल कर देने यार!
इस प्रकार कालेज रैंगिंग का यह दौर समाप्त हुआ, एक दिन कक्षा में प्रोफेसर साहब मृदा विज्ञान (fundamental of soil science) पढ़ा रहे थे, विद्यार्थियों की तरफ निगाहें दौड़ाकर विक्की से बोले..
हां तो विकास तुम मृदा निर्माण के कारक बताओ?
मृदा...सर.!
 मिट्टी तो धरती माता की देन है सर..
 प्रोफेसर साहब कुछ व्यंग भाव से बोले,
अच्छा धरती माता की देन है?
मृदा निर्माण के कितने कारक होते हैं मिस्टर (सौरभ से)
बहुत सारे. होते हैं सर..
 जैसे?( Example)
कर्ता ने,  कर्म को, करण से ,द्वारा, संप्रदान के लिए..... सौरभ के इस विनोद पूर्ण उत्तर से सारी क्लास हंस पड़ी, प्रोफेसर साहब डपट कर बोले.. चुप करो!!( Shut up)
यही पढ़ाया गया था , कर्ता ने.... बैठो! पढ़ना लिखना है नहीं बस!
मोहन तुम बताओ?.. सर मृदा निर्माण के 5 मुख्य कारक होते हैं-
जलवायु ,स्थलाकृति, कार्बनिक पदार्थ, पैतृक पदार्थ, समय...
गुड !वेरी गुड!!(good very good)
सुना सब ने ! उस दिन के बाद अपनी कक्षा में मोहन एक अच्छे विद्यार्थी के रूप में प्रतिष्ठित हो गया था, मोहन के कुछ प्रतिद्वंदी उसकी तरफ उससे दोस्ती का हाथ बढ़ा रहे थे किंतु कुछ लोग "बायस पलिअहिं अति अनुरागा। होहिं निरामिष कबहुं  कि कागा।।" वाली स्थिति में  थी । एक दिन एक दिन विक्की ने राधा को एक जगह मिलने के लिए बुलाया बातें होती शुरू हुई शायद विक्की का इरादा कुछ दूसरा ही था उस दिन उसने राधा के भरे हुए यौवन पर अपना जमाना चाहा उसका हाथ पकड़ कर अपनी और खींचने की कोशिश में विलास भरी नजर से देखने लगा , क्या? क्या देख रहे हो? तब तक विकी हाथ फेरने लगा किंतु राधा ने हाथ छुड़ाया और कहा देखो दूर रहो,है तुम मेरे एक अच्छे दोस्त हो इससे ज्यादा और कुछ नहीं। विकी बिलास भरी नजर देखते हुए बोला ,,यार दोस्ती में थोड़ा बहुत तो चलता है ना!! राधा ने अपना हाथ छुड़ाया और बोली मैं जा रही हूं तुम जैसे लोगों के पास आना ठीक नहीं है , तब तक विक्की ने राधा का हाथ पकड़ा और बोला अरे रानी अभी कैसे जाओगी? अभी तो कुछ हुआ ही नहीं विक्की के कुछ दोस्त आ चुके थे और राधा को उठाकर गाड़ी में बैठा कर दूर कहीं निर्जन स्थान पर राधा के चिल्लाते रहने के बावजूद भी ले गए,,, परंतु मोहन को इसकी भनक लगी तो उसने सोचा चोर चोर मौसेरे भाई के बीच में कौन जाए किंतु उसके संस्कार और सुशील ता ने उसे जाने पर मजबूर कर दिया और आखिरकार उसने राधा को उन दरिंदों से बचा ही लिया। उस दिन से राधा के मन में मोहन के प्रति एक विशेष आस्था और लगाव का अंकुर फूटने लगा । वही जब क्लास में डॉ निधि अग्रवाल मैम सबसे अपना अपना लक्ष्य पूछ रही थी तो सभी लोगों ने अपना अपना लक्ष्य बताया , किंतु सारे विद्यार्थियों के मन में पहले कर्म फल की लालसा थी किंतु मोहन को पहले कर्म की। अगली कड़ी में जब मैंने मोहन से पूछा मोहन कृषि विज्ञान ( agriculture)पढ़कर तुम क्या बनोगे डॉक्टर या प्रोफेसर?
मोहन बड़े सहज भाव से बोला मैम मैं कृषि के लिए काम करना चाहता हूं
ह्वाट?(what)??
कृषि के लिए मैम
आज के इस अफरा तफरी के युग में मैम! मैं समझता हूं कि कृषि को नई तकनीक से जोड़ने की आवश्यकता है जिससे हमारे देश के किसानों को लाभ होगा और उससे कोई खेती करना बंद भी नहीं करेगा क्योंकि भारत एक कृषि प्रधान देश है जहां आज युवा चकाचौंध में फंसे जा रहे हैं और खेती में जहां वह स्वस्थ जीवन गुजार सकते थे उसको नजरअंदाज करते जा रहे हैं तो मुझे लगता है मैम कि हम लोगों का परम कर्तव्य है कि हम लोगों को इस विषय में सोचना चाहिए और कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे सब को लाभ मिले, और कला, साहित्य, विज्ञान,फिल्म आदि बि‌धाओं की तरह किसान भी उच्च दर्जा प्राप्त करके एक अच्छा जीवन व्यतीत करे।
मैम अति प्रसन्न होकर बोलीं अरे वाह डियर! तुम्हारा सपना तो बहुत बड़ा है किंतु ध्यान रहे मोहन कहने में जितना आसान है यह काम करने में उतना ही कठिन है।
जी मैम किंतु अगर आप गुरुओं की कृपा बनी रही, तो मैं अपना संपूर्ण जीवन लगा दूंगा इस काम को करने में
बहुतअच्छा जरुर पूरा होगा, बेस्ट ऑफ लक!
मोहन का इतना उत्कृष्ट और विचित्र सपना सुनकर क्लास के कुछ सहपाठियों ने तारीफ की तो कुछ व्यंग। वही राधा के मन में मोहन के प्रत्यय प्रेम प्रगाढ़ होता जा रहा था, एक दिन जब राधा वाकिंग कर रही थी, तो उसकी नजर एक किताब पढ़ रहे युवक पर पड़ी, उसके पास से होकर वह निकली जा रही थी कि अचानक उसकी नजर मोहन पर पड़ी। वह रुक कर सहोत्साह बोली,,,
हाय गुड मॉर्निंग(hi good morning)
मोहन  थोड़ा अन्यमनस्क भाव से बोला गुड मॉर्निंग!(good morning) लगता है मुझसे अब भी रूठे हो तुम,मैंने सॉरी बोल दिया था ना अच्छा बाबा फिर से बोले देती हूं, सॉरी!(sorry) मोहन इस बार खुशी से बोला,, ऑल राइट! ( Allright)
वाउ अंग्रेजी(wow speak you English)
कृषि विज्ञान के अध्ययन अध्यापन में सामान्यतया  अधिकांशतः
अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाता है जिसके कारण मोहन यहां पर अंग्रेजी सीखने के लिए अंग्रेजी की पुस्तक लिए पढ़ रहा था, राधा को पता था कि मोहन की कमजोरी अंग्रेजी भाषा में है उसने मोहन को अंग्रेजी पढ़ाने के लिए मन में तय की थी, उसने मोहन से किताब ली और कहा,,
दिखाओ तो ग्रामर का कौन सा टॉपिक पढ़ रहे हो?
मोहन उसी भाव से बोला,
 राधा जी आप मुझे अंग्रेजी पढ़ाएंगी?
  राधा जी? राधा बोलना नहीं आता तुम्हें?
क्यों राधा जी?
फिर राधा जी!
आज के बाद तुम मुझे सिर्फ राधा बुलाओगे ठीक है!
ठीक है ..
मैं तुम्हारी हेल्प( help) करूंगी मोहन मैं समझ सकती हूं तुम्हारी प्रॉब्लम!(problem)
मोहन आशा भरी आंखों से राधा की ओर देख कर बोला,
सच राधा!
हां पर एक शर्त पर....
कौन सी शर्त?
पहले आई लव यू ( I love you) बोलो,
मोहन जैसे कुछ शरमाते हुए ना ना ना  ना !!!
बोलो ना
आई लव यू !(I love you)
आई लव यू टू!!(I love you to)
इस तरह राधा और मोहन का प्यार गहराई की तरफ बढ़ने लगा और एक समय आया जब उन्होंने शादी करने की ठानी राधा ने पहले भी पापा प्रोफेसर रामकुमार से इस बात का जिक्र किया था, जिससे पापा ने मोहन से मिलने की जिज्ञासा व्यक्त की थी, एक दिन समय का संयोग जानकर राधा पापा से मिलाने मोहन को अपने घर ले गई। चाय नाश्ता के बाद प्रोफेसर रामकुमार मोहन से बोले,,
कौन सी नौकरी के लिए सोचा है बेटा आपने!
सर मैं नौकरी नहीं,,, कृषि करना चाहता हूं।
क्या? क्या करना चाहते हो!
मोहन कुछ डरा हुआ सा फिर से बोला,, कृषि सर!
राधा की ओर देखकर प्रोफेसर रामकुमार बोले,, देखा ! इससे शादी करना चाहती हो तुम, इस पागल से!
लेकिन पापा....
लेकिन वोकिन कुछ नहीं ! मैंने तुम्हारी मां की अनुपस्थिति में तुम्हारा पालन -पोषण इंग्लिश कल्चर (English culture) में इसलिए नहीं किया कि तुम एक किसान से शादी करो,
और तुम मिस्टर, जाओअपनी खेती- पाती करो यहां क्यों चले आए।
मोहन प्रोफेसर के व्यंग- वाणों से आहत और अपने प्यार से बिछड़ने का गम लेकर इस प्रकार चला जैसे शाम होते ही चकोर अपनी चकोरी को छोड़ने के लिए बाध्य हो जाता है, और राधा निश्वास भरकर चकोरी की भांति मोहन से बोली.. मोहन!!!!!!!
मोहन अपनी पढ़ाई पूरी करके अपने घर चला आया और अपने सपने की ओर अग्रसर हुआ, सुबह शाम वो पढ़ाई करता जिससे कि कृषि की अप्रतिम  तकनीकों का अन्वेषण कर सके। एक दिन मोहन की मां ने मोहन को पढ़ते हुए देखकर कहा,,
अरे दादू कुछ शरीरौ का ध्यान द्यात  जा,
कतौ - कतौं घूम फिर ल्यावा कर!
अरे अम्मा पढ़िहौं तवय तो खेती -किसानी ढ़ंग से करिहौं! मां आश्चर्य से बोली,,,,
मड़ई क्या गद्याल नौकरी पांवय का पढ़त हीं ,औ तैं खेती करैं खातिर पढ़िहे!
मोहन की मां तो मां की तरह ही रह गई, किंतु जब पिता को पता चला उन्होंने मोहन को मना किया किंतु वह नहीं माना जिससे वह अप्रसन्न होकर बोले,,,
 तुही समझ  मां नहीं आवत आय?
पूरा गांव मजा ल्यात है, औ तुही कौं चिन्ता तैं तो अब ....सब जने मिलके कटुवाओ म्वा नेकुआ !!
अभी तक तो बात घर में ही थी किंतु दो -एक दिन में पड़ोस सहित पूरे गांव में  बिजली की तरह फैल गई। लपटन दौड़ता हुआ जा रहा था,सामने से उसका समव्यवसायी (उसी के जैसा काम करने वाला) कपटन दिखा, तो वह बोला ,, कपटनवा !
                        हां लपटनवा!!
                   बॉस ( Boss) कां हैं?
             छोटुवा के होटल मां चाय नमस्कार कर‌त हीं!
लपटन और कपटन मंगरू पहलवान के असिस्टेंट थे  इनका चरित्र तुलसीदास के "सहस नयन बरनइ परदोषा" (दुष्ट लोग हजार आंखों से दूसरों का दोष देखते हैं ) पंक्ति से सिद्ध होता है दोनों दौड़ते दौड़ते छोटू के होटल पहुंचे और हांफते हुए मंगरू से बोले,,,

                       बॉस, बॉस,,
     अरे का  भा लपटनवा ? कहे कूकुर जैसा हंफत था!
     अरे! बॉस भा नहीं होइगा,
         का?
       वा मोहना फारसी पढ़के तेल बेचैं लाग!
          अरे खोल के बताव यार?
      अरे मतलब वा खेती करैं लाग!
मगरू ने लपटन को थोड़ा और पास बुलाकर एक तमाचा जड़ दिया और बोला,,एत्ती नीक बात औ बुझौवल बुझावत है ससुर का नाती!!
इधर प्रधान और गिरधारी काका ने मोहन को समझाया कि गांव में ऐसा करेगा तो लोग उस पर हंसेगें, कि गया था पढ़ने और आकर हल चलाने लगा किंतु मोहन की सोच तो 'जैसे पत्थर की लकीर' हो गई थी वह कब मरने वाला था उसने पूरी तैयारी करके फसल के एक छोटे अंश जायद से खेती की शुरुआत कर दी खेत में खीरा ककड़ी खूब अच्छी तरह से हुआ मार्केट में बेचा भी गया जिससे उसे आशा हुई की फसल के अगले क्रम में जरुर सफलता मिलेगी उसने और मेहनत शुरू की और चलते-चलते रबी की फसल तक पहुंचा उसके पिता को अब कुछ विश्वास होने लगा था पर पूरी तरह से नहीं क्योंकि अभी मुख्य फसल तो बांकी है मोहन ने पलेवा शुरू की समय आया जुताई का , परन्तु मोहन के खेत तक ट्रैक्टर  मंगरू के  खेतों से ही होकर जाना था, जोकि मंगरू स्वप्न में भी होने नहीं दे सकता था ट्रैक्टर आया मोहन आगे आगे रास्ता बता रहा था तब तक मंगरू अपने दल बल के साथ अवगुणों का अन्वेषण करने पहुंचा और मोहन से बोला..
                  ए मोहना मोए खेते से टेक्टर न निकरी
                     जौं बात तौं साफ है।
                  कहे भाई मैं तो तुहीं कतउं नहिं रोकेउं?
                  म्वा‌ खेत म्वा मुंह मैं रोकत हौं, तोसे केउनों मतलब?
मंगरू की दुष्ट बुद्धि अत्यंत प्रसन्न हुई और मोहन ने मजबूर होकर ट्रैक्टर  बैक करवाया और प्रधान काका के खरिंझा हटवा कर किसी तरह से रास्ता बनाया , खेतों की जुताई बुवाई सिंचाई की गई गेहूं में उर्वरक समय से डाली गई जहां अब गेहूं मैं बाली निकलने वाली थी ,वहीं आसुरी शक्तियों का प्रकोप भी प्रबल होने लगा, रोज मोहन का खेत चर जाता और मोहन को कुछ पता ना चलता एक दिन खेत की रखवाली के लिए मोहन रात में खेत के पास ही छुप गया देखता क्या है कि एक तरफ से 20 25 मूड़ा गाएं जीभ लप -लपाती चली आ रही हैं ,आति तो तब हो गई जब तीन चरवाहे भी आंखों के सामने आए गायों को घेरते हुए लपटन दबे स्वर में बोला,,
                   बॉस आज कुछ बचावय का नहीं आय!!
                    नहीं रे वा जान जयी ,,,कि आठ दिन से हमहिंन         आय वहका खेत  चराइत ही !
मौका पाते ही कप्तान बॉस के सुर में सुर मिलाकर बोला..
               ‌ या लपटनवा बेकूफ है बॉस! अरे सांप मर जाए औ लाठिउ न टूटै तबहिंन तो मजा है!
         यह सब सुनकर मोहन सामने आया और बोला ,,
       अच्छा- अच्छा बाबू अवय तो मैं द्याखत हौं, कसत सांप मरत
          औ लाठी बची रहत थी!

   लपटन और कपटन के बार-बार छुड़ाने पर भी उस रात मोहन ने मंगरू को खूब पीटा, और पूरे गांव में यह खबर फैल गई मोहन के पिता महाराज को जैसे ही पता चला वह जले भुने मोहन के पास आए और बोले...
मो।              मोहना....... करे मोहना!!!!!!!का जरूरत रयी है मगरुआ से लड़ाई- झगड़ा करैं का?
 चंदा बड़े स्वाभिमान से बोली...कोउ हमा  खेत चराई तो ........
हां तो खुब म्वा नूकुआ कटावो समाज मां ! मोहन की मां से बोले, ले लाठी पकड़ औ तहूं जाय ,,,,
बड़े आय कासकार,,,
और जिस तेजी से आए थे वैसे ही निकल गए मगरू की ऐसी हरकत देखकर मोहन अपने खेतों की रखवाली चौकन्ना होकर करने लगा इसमें उसके दोस्त सोनू और रामू भी साथ देने लगे ।
 चैत्र का महीना आया गेहूं की कटाई फिर कतराई  हुई, नाप-जोख हुई इसमें बात यह सामने आई कि आज तक पूरे गांव में इतना अनाज किसी के यहां नहीं हुआ सुनने वाले हक्का-बक्का रह गए गिरधारी काका मोहन के पिता से रास्ते में मिले तो बड़े उत्साह से बोले..
              अरे हरखू भाई! हरषू भाई!!
          हां गिरधारी!
मा।     मानय का परि भाई पूरे गांव मां सब जने मोहन के पड़ाई करत हीं! तब तक प्रधान काका भी पहुंच चुके थे बोले,,
             त्वा गदेल संस्कार औ गुण मां गांव उपर है हरषू!
मोहन के पिता आज गदगद हो गए शायद एक पिता के लिए इससे बड़ी खुशी और कुछ नहीं हो सकती, हरखू यादव घर पहुंचे और बाहर से ही लगे आवाज लगाने मोहन के अम्मा!
              ए मोहन के अम्मा!!
    कहे चिल्लाते हौ , काहाय??
             अरे कुछ सुने?
                का?
          अरे पूरा गांव हमए मोहन के बड़ाई करत है!
                 वाह! बेटवा खुश कयी दीने
मोहन के पिता को मोहन के पक्ष में देखकर मोहन की मां को उसके पिता से दुगनी खुशी हुई मोहन का कर्म और कर्म फल संपूर्ण क्षेत्र में फैल गया वहीं विधानसभा के विधायक ने किसानों का मनोबल बढ़ाने के लिए मोहन को 'सर्वश्रेष्ठ किसान सम्मान 'से सम्मानित किया और प्रत्येक वर्ष सर्वश्रेष्ठ किसान को किसान सम्मान से सम्मानित करने की करने की घोषणा भी की।
 मीडिया वालों को पता चला तो वह भी मोहन का इंटरव्यू लेने आए ,पत्रकारिता के क्षेत्र में मजे हुए पत्रकार मनोज कुमार मोहन से बोले...
            मोहन भैया नमस्कार !
मोहन सहोत्साह बोला... जी नमस्कार !!
भैया सबसे पहले हम आपसे यह जानना चाहेंगे इतना पढ़ने वाला लड़का पढ़ाई छोड़ कर कृषि के क्षेत्र में कैसे आ गया?
मोहन मोहन गहनतर विचारावेग से बोला..
        देखिए मुझे लगता है कि पढ़ाई का अर्थ केवल और केवल नौकरी नहीं है पढ़ाई का अर्थ ज्ञान प्राप्त करना है !और ज्ञान की आवश्यकता जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में होती है चाहे वह टीचिंग हो किसानी हो एक्टिंग हो अथवा व्यावहारिक जीवन ही क्यों ना हो !इसलिए मैंने सोचा क्यों ना मैं अपने ज्ञान का प्रयोग किसानी में करूं जिससे हमारे देश के अन्नदाता की स्थिति सुधरे!
मनोज जी ने फिर दूसरा सवाल मोहन से किया,, मोहन भैया जैसे अभी यह देखा गया की जितना आपके यहां उत्पादन हुआ है उतना पूरे गांव में कभी और किसी किसान के यहां नहीं हुआ था, यहां तक कि खेती के उत्पादन से किसानों की लागत तक पूरी नहीं होती थी तब यह कैसे संभव हुआ ?
मोहन बोला... उत्पादन की पर्याप्त मात्रा तक पहुंचने के लिए मायने में नहीं रखता कि आप मेहनत करते हैं या नहीं हालांकि मेहनत का रोल तो उसमें है ही किंतु उसमें विशेष बात यह है कि तकनीकी क्या है आप किस ढंग से खेती कर रहे हैं समय से पलेवा करना जुताई करवाना, सिंचाई करवाना जैविक और रासायनिक दोनों प्रकार के खातों का समुचित प्रयोग करना उत्पादन के लिए मायने रखता है मैंने इसी का प्रयोग किया है और मैं अपने युवा साथियों से चाहूंगा कि जितने लोग इस न्यूज़ को सुन रहे हैं वह सारे लोग नई तकनीकों का प्रयोग करें और अपने देश को खुशहाल बनाएं ।             
मीडिया के माध्यम से मोहन पूरे देश में किसानों के लिए एक मिसाल बन गया वहीं जब राधा के साथ साथ उसके पापा को यह बात पता चली तो वह मोहन के घर आए अब उससे माफी मांगी तथा मोहन और राधा के विवाह का प्रस्ताव उसके पिताजी के पास रखा और दोनों पक्षों की सहानुभूति से राधा और मोहन का विवाह हो गया  और नाना प्रकार की खुशियां उनके यहां घर करने लगीं।


                                                          - जी• एल• 'चित्रकूटी'








          

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