कविता

  • कविता  ---


                                                
                                                          कैसा होगा तू रूप तेरा,     
हे ईश तुझे क्या कह दूं मैं
यदि कहता जगदाधार तुझे,            
तो कहीं गलत न कह दूं मैं ।।०१

ये परिवर्तन का पुतला मेरा ,
कहीं हो जाय न गुम ये कृपा करना।
सांसारिक तृष्णा माया का,
कहीं तृषित न हो ये दया करना।।०२

नव चेतना हो चंचल मन में, हिरदय में सुभावना उग आएं ।
जीवन ज्योति असीम जले, पै जले जस दीपक ज्योतिर्माए।।
रहें अपने कर्तव्य में लीन, बढ़ें शिखरो को, तमन्ना पुराएं।
कहत गनेशी या नववर्ष की मन से सबको अति शुभकामनाएं।।०३

जानत है मानत नहीं, कथा कहत है नित्त ।
भवसागर के बीच में, पड़ा चूतिया चित्त।।
पड़ा चूतिया चित्त,भरे नित आंहे दुःख की ।
तहूं न नेकु सँकोच , न छोड़े बांहे उसकी ।।
गनेशी चित से विबस होय बेबस न मानत ।
जीवन ले करि कदाचार है सब कुछ जानत ।।०४
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       नव वर्ष सन् २०२० के उपलक्ष्य में ----
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आना -जाना लगा रहेगा,
अटल नियम यह सृष्टि का है ।
अफरा-तफरी के इस युग में,
मुद्दा एक समष्टि का है ।।

साक्षरता का बाना लेकर ,
निकले थे हम भेद मिटाने ।
अक्षर स्वयं निरक्षर होकर,
कूटनीति के बुनता ताने ।।

पढ़े-लिखे ही कट्टर देखे,
कह दूँ यदि सच्चाई ।
अनपढ़- हिन्दू,अनपढ़- मुस्लिम ,
सब थे भाई-भाई ।।

मन से अपने-अपने यदि तुम,
अब कटु भाव मिटा लो ।
'चित्रकूटी' तब स्वागत सब का,
मिल नव वर्ष मना लो ।। ०५
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           प्रेम  -------
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क्या कहें इस दुनियाँ को हम ,
ये दुनियाँ बहुत सताती है ।
जितना इससे बचना चाहें,
ये उतना ही ठुकराती है ।।

हम प्रेम को पूजा मान किए,
वह स्वार्थ बना कब क्या जाने।
हम पर वह जान छिड़कती थी,
अब कहाँ छिड़कती क्या जाने।।

पर पहले से कुछ बदला था,
पत्थर से मैं कुछ पिघला था।
जीवन-यथार्थ उससे जाना,
नहीं धूप को छाँव समझता था।।

अब रास समय तो आता है,
बीती यादें दुहराता है।
पर भाव-विकलता कहाँ गई,
कुछ-कुछ ही समझ में आता है।। ०६

     
            लोग क्या कहेंगे  ----
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वह चाहता था
सातवें आसमान की सैर करना
पर बिना ताकत लगाए,
दिखाना चाहता था
अपना उदात्त गौरव
जब करने का समय आता,
तो वह सोचने लगता
लोग क्या कहेंगे?

छुपाता था खामियों  को
वह अपने ही परों में,
'कुछ तो लोग कहेंगे'
वह जानता था इसे
लोगों को समझा भी देता था,
पर 'ऊँट जब भी आता पहाड़ के नीचे'
सोचने लगता
लोक क्या कहेंगे?

एक दिन जब भेंट हुई,
जाँबाज से
शीत-युद्ध शुरू हुआ
बाज की हवा गायब,
'आँगन टेढ़ा है' ,
बड़ी दृढ़ता से कहा उसने
कहता था सबको
जैसे हर बार
पर नहीं गली दाल इस बार उसकी
सच कहूँ तो वही गल गया ,
सबकी नजर में नहीं
बस अपनी नजर में ।

नहीं उड़ता हवा में वह अब
किसी को नीचा दिखाने
के लिए,
वह समझ गया
कोई कुछ नहीं कहता-वहता बस देखता है
कौन ऊपर है कौन नीचे,
अब वह नहीं सोचता
लोग क्या कहेंगे ।







     
                      


                  दोहावली -----







प्रनवउँ गुरु के पद कमल, जिन्ह कीन्हों जग काज।
तम समुद्र बूड़त लख्यो, प्रगट्यो ज्ञान जहाज।।

विना गुरु के ज्ञान नहिं, ज्ञान विना नहिं धर्म ।
धर्म बिना सत्कर्म नहिं, जीव न जाने मर्म।।06

भले समय सब खुश रहें, बुरे रहे न कोय।
गनेशी जे उभयो रहे, जगत परे है सोय।।07

कर्ता कर्म सम्प्रकरण, अधिकरण अपादान।
छः कारक के विधान से, संस्कृत है अम्लान ।।08

स्वयं अर्थ साधन हित, नेह करे संसार ।
गनेशी स्वाम्य गर नहीं, जीवन होय निसार।।09

जीत हार में होत है, ऐसी नेह की रीति ।
अकड़े जो इस गाँव में, निभे न तासे प्रीति।।10

झिमिर-झिमिर वारिद बरसे, दादुर मन भरि जाय।
पीव-पीव पपिहा करे, दशा न बरनी जाय।।11

अभि चिन्ता स्मृति कथन, वेगोन्माद प्रलाप।
जड़ता व्याधि मरण दश,कहें वियोग संताप।।12

हरि हिमांचल मध्यदेश,दिल्ली राजस्थान।
खण्ड-खण्ड उत्तर भया, गढ में हुआ बिहान।।13






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