लाॅकडाउन......
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 लाॅकडाउन!
क्या है ये लाॅकडाउन?   
 उनके प्रश्न पर फिर मैंने तोड़ा मौन,
कहा अब घर से बाहर नहीं जाना!
सच बताना?
हो गईं सारी व्यवस्थाएं बन्द
घर में रहो दिन कुछ चंद !
सरकार का यह ऐलान है 
बंद सारी दुकान हैं
कैद घरों में इंसान हैं हर तरफ
पसरा श्मशान है।
हठात् हंसी निकली उनकी 
पास पड़ी थी रसोई जिनकी बोलीं, 
मैं तो पर हूं आजाद!
क्या बांध सकेगी मुझे सरकार ?
देखो! मैं तो जा सकती हूं
कहीं भी! कभी कमरे की इस देहरी
 तो कभी उस देहरी
मैंने भी बेख़ौफ़ उनको घूमते पाया,
कभी रसोई तो कभी बगिया ।
देते देखा पौधों को पानी,
सींचते देखा
घर का हर एक प्राणी।
किचेन से फिर बाहर आकर
मुझे नास्ते की प्लेट सरकाकर बोलीं ,
लाॅकडाउन से क्या मेरा सरोकार
यही है मेरी दुनिया
यही मेरा संसार।


                                             - प्रतिभा भारती



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